मृदा परीक्षण क्या है? मृदा परीक्षण क्यों जरूरी है?
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां कृषि न केवल आजीविका का प्रमुख साधन है बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। खेती को लाभदायक और टिकाऊ बनाने के लिए सबसे जरूरी है — मृदा की सेहत को समझना और उसके अनुसार उर्वरक का प्रबंधन करना। इसी प्रक्रिया को हम “मृदा परीक्षण और उर्वरक प्रबंधन” कहते हैं।
मृदा परीक्षण क्या है?
(Soil Testing) एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मिट्टी के पोषक तत्वों की मात्रा, pH मान, नमी, जैविक पदार्थ और अन्य तत्वों की जानकारी प्राप्त की जाती है। यह परीक्षण किसानों को बताता है कि उनकी मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है और किस प्रकार के खाद की जरूरत है।
मृदा परीक्षण क्यों जरूरी है?
बिना परीक्षण के किसान अक्सर ज्यादा या कम खाद डाल देते हैं, जिससे या तो फसल को नुकसान होता है या मिट्टी की उर्वरता घट जाती है। परीक्षण से सही मात्रा में खाद का उपयोग संभव होता है।
नियमित परीक्षण से मिट्टी की सेहत का पता चलता रहता है और समय पर सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। सही उर्वरक प्रबंधन से पौधों को संतुलित पोषण मिलता है, जिससे उपज की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ती हैं। अनावश्यक उर्वरक पर खर्च घटता है, जिससे खेती की लागत कम होती है।
उर्वरक प्रबंधन के मुख्य उपाय
संतुलित उर्वरक का उपयोग: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) का संतुलित उपयोग करें।
जैविक खाद का प्रयोग: गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट आदि से मिट्टी की संरचना सुधरती है और सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है।
हरी खाद का उपयोग: धैचा, सन जैसी फसलें उगाकर मिट्टी में मिलाने से नाइट्रोजन की पूर्ति होती है।
फसल चक्र अपनाना: एक ही खेत में बार-बार एक ही फसल लगाने से कुछ पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। फसल चक्र अपनाने से मिट्टी संतुलित रहती है।



